Saturday, July 12, 2008

शायद नही है...


शहर में गांव सा मंज़र नही है,
समंदर है मगर कौसर नही है

ज़रा एहसास की शम्मा जला‌ओ,
जो अंदर है अभी बाहर नही है

जो दश्त-ए-गैर को पुरनम न कर दे,
वो कतरा आब है गौहर नही है

अगर हो बदगुमां तो आज़मालो,
यहां बस फूल हैं पत्थर नही है

ज़मीं पे जिस्म के टुकडे पडे थे,
वहां मस्जिद नही... मन्दिर नही है

ज़मीं है आसमां है ज़िन्दगी है,
ये बातें और हैं की घर नही है

बता देता हूं यारों एहतियातन,
कलम आवाज़ है खंजर नही है

ये तेरे इश्क की शिद्दत है "रंजन",
तुझे वो दिख रहा है पर नही है

13 comments:

सतीश पंचम said...

Nice one.

Udan Tashtari said...

बता देता हूं यारों एहतियातन,
कलम आवाज़ है खंजर नही है


--वाह!!

राजीव रंजन प्रसाद said...

ज़रा एहसास की शम्मा जला‌ओ,
जो अंदर है अभी बाहर नही है

ज़मीं पे जिस्म के टुकडे पडे थे,
वहां मबता देता हूं यारों एहतियातन,

कलम आवाज़ है खंजर नही है
वहाँ मस्जिद नही... मन्दिर नही है

बेहतरीन..


***राजीव रंजन प्रसाद

www.rajeevnhpc.blogspot.com

नीरज गोस्वामी said...

ज़मीं पे जिस्म के टुकडे पडे थे,
वहां मस्जिद नही... मन्दिर नही है
ज़मीं पे जिस्म के टुकडे पडे थे,
वहां मस्जिद नही... मन्दिर नही है
सुभान अल्लाह रंजन भाई...बेहतरीन. इतनी खूबसूरत ग़ज़ल देने के लिए बहुत बहुत बधाई....ये उम्र और ये तेवर...खुदा नजरे बाद से बचाए...
बहुत देखें हैं शायर हमने नीरज
तेरे जैसा मगर "रंजन" नहीं है
नीरज

रंजन गोरखपुरी said...

करम है मालिक का जो आप सभी आलिम नवाज़ों से कलम को हौसला मिला! तहे दिल से सबका शुक्रिया...
नीरज साहब आपका शेर नवाज़िश है नाचीज़ पर...

डॉ .अनुराग said...

ज़मीं है आसमां है ज़िन्दगी है,
ये बातें और हैं की घर नही है
bahut badhiya....ranjan....

उत्पल कान्त मिश्रा "नादां" said...

Ranjan Sa'ab .....

Aapki padhi hui saari ghazlon main sabse behtareen mujhe yeh waali lagi .... aur kya kahoon .... alfaz dhokha de rahe hain ...

kahin dil ke andar gahre main paibasta ho gaya hai aapka yeh ashaar

PREETI BARTHWAL said...

ज़मीं है आसमां है ज़िन्दगी है,
ये बातें और हैं की घर नही है

बता देता हूं यारों एहतियातन,
कलम आवाज़ है खंजर नही है

सुन्दर बहुत सुन्दर

pallavi trivedi said...

ज़मीं पे जिस्म के टुकडे पडे थे,
वहां मस्जिद नही... मन्दिर नही है

ज़मीं है आसमां है ज़िन्दगी है,
ये बातें और हैं की घर नही है

बता देता हूं यारों एहतियातन,
कलम आवाज़ है खंजर नही है

waah amit...pahle bhi padhi hai ye ghazal. bahut umda hai.

डॉ .अनुराग said...

ज़मीं है आसमां है ज़िन्दगी है,
ये बातें और हैं की घर नही है

बता देता हूं यारों एहतियातन,
कलम आवाज़ है खंजर नही है

ये तेरे इश्क की शिद्दत है "रंजन",
तुझे वो दिख रहा है पर नही है

एक ओर दिन बेहतरीन बना दिया आपने......

रंजू भाटिया said...

ज़मीं है आसमां है ज़िन्दगी है,
ये बातें और हैं कि, घर नही है

वाह बेहतरीन ....

seema said...

o trees of life,when does your winter come?we are not in harmony,our blood does not forwarn us..like migrating birds late,overtaken,we force ourselves abruptly on to the wind and fall to earth at some iced-over lake...
flowering & fading come to us both at once....--rilke..
aapko padh ke rilke yaad aata hai...

Unknown said...

Bahut Khoob,,,,,,