मेरी मंज़िल हो राहबर तुम हो,सियाह रात के अख्तर तुम हो
कहीं हो गूंज शंख नादों की,
कहीं नमाज़ का मंज़र तुम हो
जो खो गया तो पा लिया तुमको,
मेरे अंदर मेरे बाहर तुम हो
सफ़र जो दश्त से गुज़रता है,
मेरी उम्मीद का सागर तुम हो
उतर गए हो इस कदर गोया,
कोई नश्तर कोई खंजर तुम हो
भला कैसे गुमान हो उसको,
लिखे "रंजन" मगर शायर तुम हो

