चलो सुबह की ओर चलें हमअंधियारे को मिटाना होगा,
बहुत दिनो हम रूठ चुके
अब मिलकर साथ निभाना होगा
खून से सिंचित हुई धरा थी
तब फ़सलें लहलाई थीं,
आज़ादी का पाठ शुरू से
दोनो को दोहराना होगा
बिखर गई थी मानवता
जब जंगें तीन लडी हमने,
हाथ में लेके अमन पताका
अब हिंसा को हराना होगा
एक दूजे पर साधे हैं हम
व्यर्थ ही अग्नि गोरी को,
परमाणु शक्ती को घर घर
बिजली बन दौडाना होगा
’स्वर्ग अंश’ पर खून खराबा
करके हमने क्या पाया,
मेल-मिलाप बढाकर अब तो
सरहद को झुठलाना होगा
बस और ट्रेन तो चल ही चुकी है
अब दरकार बची इतनी,
पासपोर्ट वीसा नियमों को
ताक पे रखते जाना होगा
उधर शोएब ’और अफ़रीदी तो
इधर भी हैं सहवाग सचिन,
साथ में लाकर इनको अब
दुनिया को धूल चटाना होगा
"रंजन" जिस दिन खडे हो गए
’दोनो’ हाथों को थामे,
हिन्द-पाक का जयकारा फिर
अखिल विश्व को गाना होगा





